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स्वामी चिनमयानंद बापू
भारत आस्थाओं का देश है…जहां भाव भी है…राग भी है और ताल भी…संत महात्माओं का देश है भारत…ज्ञानी महापुरुषों का देश है भारत…यहां के कण कण में ईश्वर का वास है…वेदों पुराणों की जननी है भारत……इतिहास साक्षी है कि जब जब मनुष्य प्रकाश से अंधकार की ओर विमुख हुआ…ज्ञान रुपी प्रकाश से अंधकार की ओर बढ़ने लगा..तब तब ज्ञान की अविरल ज्ञान गंगा बहाने के लिए…कर्तव्य पथ पर चलने की सीख देने के लिए…ईश्वर की अनुभुती का एहसास कराने के लिए…महान संत महात्माओं ने जन्म लिया…और जनमानस को ज्ञान रुपी सन्मार्ग की ओर चलने को प्रेरीत किया…
समय बदला…परिवेश बदला…लोगो की जरुरतें बढ़ी…तो मोह माया भी अपने पांव पसारने लगी…जिसका परिणाम हुआ की जीवन के उतार चढ़ाव और जरुरतों में मनुष्य इतना रम गया कि स्वाध्याय,सत्संग से दुर हो गया…
ऐसे निराशा भरे परिवेश से मुक्ति पाना….मन और चित्त को शांत करने के लिए 4 दिसंबर 1980 को एक दैविय आत्मा ने ब्राम्हण कुल में जन्म लिया…पतित पावनी मां गंगा नदी के किनारे उत्तर प्रदेश के जिला मिर्जापुर के एक छोटे से गांव कलना में एक ऐसे असाधारण बालक का धरा पर प्राकट्य होता है…जिसके मस्तक का तेज..ओज…उसे औरों से अलग पहचान देती है…जो धिरे धिरे समाज में,सामाजीक परिवेश में पलना बढ़ना तो सिखता है…लेकिन मन ईश्वर भक्ति में रमा होता है…जिसके मन में राम…मुख में राम…और रोम रोम में मर्यादापुरुषोत्तम राम की छवी बनी रहती है….मां बाबूजी ने अपने ओजस्वी बालक का नाम भी रखा तो उदय प्रकाश…एक ऐसा ज्ञान रुपी प्रकाश जिसकी किरणे धरा पर ऐसी रोशनी बिखेरे की अज्ञानता का तम छंट जाए…खत्म हो जाए…।।
जी हां वो तेजमयी…ओजस्वी बालक कोई और नहीं…परम पुज्य….स्वामी चिन्मयानंद बापू ही हैं…जिनकी कीर्ति…ख्याती विश्व भर में फैली हुई है…जिनके मुखारबिन्द से निकली हुई हरि चर्चा का रसपान करने के लिए जनमानस लालायित रहता है…
बापू का जीवन बड़ा ही संघर्षमय रहा है…महज 9 वर्ष की आयू में ही बापू गृह त्याग देते हैं…और संतो के सत्संग में आ जाते हैं…और एक बार संतों के सत्संग में रम जाने के बाद फिर क्या कहने…बापू भी सहज ही स्विकार करते हैं कि किस प्रकार और कैसे प्रभु श्री राम के बन जाते हैं…ये पता ही नहीं चलता….कहा भी जाता है कि भाव वत्सल भगवान…कब राघव जी की कृपा स्वामी जी पर बरसने लगती है…बापू कब राम में रम जाते हैं पता ही नहीं चला…
समय अपनी गति से निरंतर आगे बढ़ रहा था…बापू को अब ऐसे गुरु की तलाश थी….जिनके दिव्य ज्ञान से ओतप्रोत होकर बापू कर्तव्य पथ पर निरंतर आगे चल सकें…और ये तलाश बापू की समाप्त होती है सरयू के तट पर आ कर…अवध धाम में आकर…राजा रामचन्द जी महाराज की नगरी अयोध्या में आकर…परम पुज्य…प्रात स्मरणीय…वंदनीय श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर श्री रामकुमार जी महाराज के सानिध्य में आकर…गुरु जी से दिक्षा लेकर बापू विश्व भर में सनातन धर्म की ध्वजा को फैलाने के लिए निकल पड़ते हैं और श्री राम कथा के माध्यम से भारतवर्ष का नाम विश्वभर में फैलाते हैं…
कहते हैं आप के विश्वास में जितनी शक्ति होगी…. जितना बल होगा… जितना गुरुत्व होगा.और .जितनी आत्मनिर्भरता होगी… आपके विचार भी उतने ही प्रबल होंगे….अगर आपका विश्वास कमजोर है तो आपकी सोच भी दुर्बल होगी.. जिस इंसान का विश्वास गहरा हो…. गम्भीर हो…. उसका समूचा व्यक्तित्व निखर जाता है….समय के साथ साथ बापू की ख्याती देश विदेश मैं फैलने लगी…क्योंकि विश्वास वो चीज है जिस पर दुनिया कायम है…… और इस विश्वास में अगर आस्था का मीठा घोल भी शामिल हो जाए.. तो इंसान की दुनिया बदलते देर नहीं लगती…. परमपूज्य स्वामी चिनमयानंद बापू की महिमा भी कुछ ऐसी ही है….कि जो भी उनसे जुड़ा… उसकी जिंदगी खुशियों से भर गई और दुखों के बादल आस्था की रौशनी में धुंधले पड़ गए….
बापू का गंगा मैया से प्रेम सहज ही झलक उठता है….बापू का जन्म भी गंगा मैया के तिरे हुआ…और साधना स्थली भी मां गंगा की गोद बनी….जी हां हरि का द्वार यानी हरिद्वार….जहां प्रकृती की गोद में….पहाड़ों के बीच…गंगा मैया के पवित्र तट पर बापू ने आश्रम का निर्माण किया….और कल कल बहती मां गंगा के किनारे चिंतन आरंभ किया….चिंतन ईश्वर के प्रति…चिंतन समाज के प्रति….समाज में फैली बुराईयों को दुर करने के प्रति…।।।

संदीप कुमार मिश्र

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